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dkunwar |
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, May 18 2009, 5:35 AM EDT
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| Started By | Thread Subject | Replies | Last Post | ||
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| dkunwar | Introduction | 0 | Sep 25 2008, 7:25 AM EDT by dkunwar | ||
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Thread started: Sep 25 2008, 7:25 AM EDT
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हिमालयन गजेटियर (वोल्युम III, भाग II ) वर्ष 1882 में ई.टी. एटकिंस के अनुसार कहा जाता है कि कभी शहर की जनसंख्या काफी थी तथा यह वर्तमान से कही अधिक विस्तृत था। परंतु अंग्रेजी शासन के आ जाने से कई वर्ष पहले इसका एक-तिहाई भाग अलकनंदा की बाढ़ में बह गया तथा वर्ष 1803 से यह स्थान राजा का आवास नहीं रहा जब प्रद्युम्न शाह को हटा दिया गया जो बाद में गोरखों के साथ देहरा के युद्ध में मारे गये। इसी वर्ष एक भूकंप ने इसे इतना अधिक तबाह कर दिया कि जब वर्ष 1808 में रैपर यहां आये तो पांच में से एक ही घर में लोग थे। बाकी सब मलवों का ढेर था। वर्ष 1819 के मूरक्राफ्ट के दौरे तक यहां कुछ मोटे सूती एवं ऊनी छालटियां के घर ही निर्मित थे और वे बताते हैं कि यह तब तक वर्ष 1803 के जलप्लावन तथा बाद के भूकंप से उबर नहीं पाया था, मात्र आधे मील की एक गली बची रही थी। वर्ष 1910 में (ब्रिटिश गढ़वाल, ए गजेटियर वोल्युम XXXVI) एच.जी. वाल्टन बताता है, “पुराना शहर जो कभी गढ़वाल की राजधानी तथा राजाओं का निवास हुआ करता था उसका अब अस्तित्व नहीं है। वर्ष 1894 में गोहना की बाढ़ ने इसे बहा दिया और पुराने स्थल के थोड़े अवशेषों के अलावा यहां कुछ भी नहीं है। आज जहां यह है, वहां खेती होती है तथा नया शहर काफी ऊंचा बसा है जो पुराने स्थल से पांच फलांग उत्तर-पूर्व है।”
श्रीनगर के लोगों की भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में गहरी जुड़ाव थी तथा वर्ष 1930 के दशक के मध्य यहां जवाहर लाल नेहरू एवं विजयलक्ष्मी पंडित जैसे नेताओं का आगमन हुआ था। हिस्सा बना, जिसका बाद में उत्तराखंड नाम पड़ा। भारत की स्वाधीनता के बाद श्रीनगर, उत्तर प्रदेश का एक भाग बना और अब यह वर्ष 2000 में निर्मित उत्तरांचल राज्य का |
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| dkunwar | Introduction of Srinagar aGarhwal | 0 | Sep 25 2008, 7:24 AM EDT by dkunwar | ||
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Thread started: Sep 25 2008, 7:24 AM EDT
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इतिहास के आधार पर श्रीनगर हमेशा ही महत्वपूर्ण रहा है क्योंकि यह बद्रीनाथ एवं केदारनाथ के धार्मिक स्थलों के मार्ग में आता है। बहुसंख्यक तीर्थयात्री इस शहर से गुजरते हुए यहां अल्पकालीन विश्राम के लिये रूकते रहे हैं। फिर भी नैथानी बताते हैं कि श्रीनगर के राजा ने हमेशा यह सुनिश्चित -संतों तकिया कि साधुथा आमंत्रित आगंतुकों को छोड़कर अन्य तीर्थयात्री शहर के बाहर से ही जयें क्योंकि उस समय हैजा का वास्तविक खतरा था। गढ़वाल में एक पुरानी कहावत थी कि अगर हरिद्वार में हैजा है तो वह 6 दिनों में बद्रीनाथ में फैलने का समय होता था (अंग्रेज भी हैजा को नियंत्रित करने में असमर्थ रहे तथा कई लोगों द्वारा इस रोग के विस्तार को रोकने के लिये घरों को जला दिया जाता था तथा लोगों को घरों को छोड़कर जंगल भागना पड़ता था)।
वर्ष 1803 से नेपाल के गोरखा शासकों का शासन (1803-1815) यहां शुरू हुआ। समय पाकर गढ़वाल के राजा ने गोरखों को भगाने के लिये अंग्रेजों से संपर्क किया, जिसके बाद वर्ष 1816 के संगौली संधि के अनुसार गढ़वाल को दो भागों में बांटा गया जिसमें श्रीनगर क्षेत्र अंग्रेजों के अधीन हो गया। इसके बाद गढ़वाल के राजा ने अलकनंदा पार कर टिहरी में अपनी नयी राजधानी बसायी। श्रीनगर ब्रिटिश गढ़वाल के रूप में वर्ष 1840 तक मुख्यालय बना रहा तत्पश्चात इसे 30 किलोमीटर दूर पौड़ी ले जाया गया। वर्ष 1894 में श्रीनगर को अधिक विभीषिका के सामना करना पड़ा, जब गोहना झील में उफान के कारण भयंकर बाढ़ आई। श्रीनगर में कुछ भी नहीं बचा। वर्ष 1895 में ए के पो द्वारा निर्मित मास्टर प्लान के अनुसार वर्तमान स्थल पर श्रीनगर का पुनर्स्थापन हुआ। वर्तमान एवं नये श्रीनगर का नक्शा जयपुर के अनुसार बना जो चौपड़-बोर्ड के समान दिखता है जहां एक-दूसरे के ऊपर गुजरते हुए दो रास्ते बने हैं। नये श्रीनगर के मुहल्लों एवं मंदिरों के वही नाम हैं जो पहले थे जैसा कि विश्वविद्यालय के एक इतिहासकार डॉ दिनेश प्रसाद सकलानी बताते हैं। |
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| dkunwar | Introduction of Srinagar Garhwal | 0 | Sep 25 2008, 7:22 AM EDT by dkunwar | ||
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Thread started: Sep 25 2008, 7:22 AM EDT
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श्रीनगर से 18 किलोमीटर दूर।
से 5 किलोमीटर दूर देवलगढ़ के गोरखपंथी गुरू सत्यनाथ के एक शिष्य के रूप में शरण ली। उन्होंने उसे अपनी राजधानी श्रीनगर में बनाने की सलाह दी। श्रीनगर के चयन का दूसरा कारण अलकनंदा की चौड़ी घाटी की स्थिति था। नैथानी के अनुसार वहां एक प्राचीन दक्षिण काली का मंदिर था तथा तत्कालीन मंदिर के पुजारी ने भविष्यवाणी की थी कि श्रीनगर में बहुत लोग आयेंगे इतने लोग कि उनके लिए दाल छौकने के लिये एक टन हींग की आवश्यकता होगी। भविष्यवाणी सच साबित हुई तथा अजय पाल के अधीन श्रीनगर उन्नतशील शहर बन गया जिसने यहां वर्ष 1493-1547 के बीच शासन किया तथा अपने अधीन 52 प्रमुख स्थलों को एकीकृत किया। उस समय गढ़वाल राज्य का विस्तार तराई के कंखल (हरिद्वार) एवं सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) तक हुआ। उनकी मृत्यु के बाद उसके कई वंशजों ने यहां शासन किया। वर्ष 1517 से 1803 तक पंवार राजाओं की राजधानी श्रीनगर थी और इस वंश के 17 राजाओं ने यहीं से शासन किया। अजयपाल के बाद सहज पाल एवं बलभद्र शाह ने इस शहर एवं राजमहल को संवारने का प्रयास किया, पर राजा मान शाह वास्तव में इस शहर को प्रभावशाली बनाने में सफल हुआ। यद्यपि स्थायी तौर पर श्रीनगर तथा कुमाऊं के राजाओं के बीच झड़पे होती रही, पर दोनों पहाड़ी राज्यों को मैदानी ताकतों के अधीन कभी भी न होने का गौरव प्राप्त था। वास्तव में शाहजहां के समय यह कहा गया कि पहाड़ी राज्यों पर विजय पाना सबसे कठिन था। |
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2kmvm9.jpg (JPEG Image - 38k)
posted by dkunwar Mar 24 2009, 7:04 AM EDT
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